बस्तर में 'लाल आतंक' के अंत की आहट: 25 साल, 1277 ब्लास्ट, लेकिन अब 'आईईडी मुक्त' होगा अबूझमाड़
31 मार्च 2026 की डेडलाइन के साथ बस्तर में माओवाद का अंत करीब है, लेकिन जमीन के नीचे छिपा IED अब भी बड़ी चुनौती है। जानें 25 सालों का खौफनाक आंकड़ा, 1277 ब्लास्ट और डिप्टी सीएम विजय शर्मा का 'IED मुक्त बस्तर' अभियान। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।Puja Sahu
जगदलपुर : विशेष संवाददाता देश से माओवाद खत्म करने के लिए सरकार द्वारा तय की गई 31 मार्च 2026 की समयसीमा अब बेहद करीब है। जैसे-जैसे यह निर्णायक घड़ी पास आ रही है, बस्तर की धरती से एक बड़ी हकीकत सामने निकल कर आई है। नक्सलवाद के खिलाफ युद्ध में बंदूकें तो शांत हो रही हैं, लेकिन जमीन के नीचे दबा 'अदृश्य दुश्मन' यानी आईईडी (IED) अब भी सुरक्षाबलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
ढाई दशक का खूनी खेल: आंकड़ों की जुबानी
पिछले 25 वर्षों का इतिहास गवाह है कि नक्सलियों ने आमने-सामने की लड़ाई से ज्यादा नुकसान आईईडी के जरिए पहुँचाया है। साल 2001 से 2026 तक के आंकड़े रोंगटे खड़े करने वाले हैं:
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कुल घटनाएं: 1277 आईईडी ब्लास्ट।
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जवानों की शहादत: 443 जांबाज शहीद, 915 घायल।
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नागरिकों पर वार: 158 मासूमों की मौत, 250 घायल।
सबसे खौफनाक साल: 2010, जब अकेले आईईडी ने 101 जवानों की जान ले ली थी।
2026: राहत की नई किरण
हालाँकि, साल 2026 एक सुखद बदलाव का संकेत दे रहा है। इस वर्ष अब तक आईईडी से एक भी जवान शहीद नहीं हुआ है। यह पिछले ढाई दशक में पहली बार है जब बस्तर की धरती आईईडी के कारण जवानों के खून से लाल नहीं हुई। यह सुरक्षाबलों की बदली हुई रणनीति और सतर्कता का ही परिणाम है।
रक्षात्मक से आक्रामक: बदली रणनीति ने तोड़ी कमर
नक्सल मुक्त बस्तर की राह में सबसे बड़ा रोड़ा रहे आईईडी को बेअसर करने के लिए फोर्स ने अब अपनी रणनीति बदल दी है। अब सुरक्षाबल केवल हमले का इंतजार नहीं करते, बल्कि जमीन खोदकर मौत के इस सामान को ढूंढ निकालते हैं।
रिकॉर्ड बरामदगी: पिछले 26 वर्षों में कुल 4580 आईईडी जब्त किए गए। अकेले 2025 में रिकॉर्ड 860 आईईडी बरामद कर नक्सलियों के मंसूबों को ध्वस्त किया गया। विशेषकर करेगुट्टा ऑपरेशन ने माओवादियों के सप्लाई चेन और नेटवर्क की कमर तोड़ दी है।
ODF की तर्ज पर अब 'IED मुक्त' बनेगा बस्तर
छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए एक बड़ा संकल्प दोहराया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जिस तरह गांवों को 'ओडीएफ' (खुले में शौच मुक्त) बनाया गया, उसी तर्ज पर अब पूरे बस्तर को 'आईईडी मुक्त' बनाने का अभियान चलाया जाएगा।
माओवाद अपने अंतिम दौर में है, लेकिन नक्सलियों द्वारा बिछाया गया बारूद अब भी हर कदम पर खतरे की तरह मौजूद है। शासन और प्रशासन का मानना है कि असली जीत केवल संगठन को खत्म करने में नहीं, बल्कि बस्तर की मिट्टी को पूरी तरह सुरक्षित और बारूद मुक्त बनाने में है।
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