धमतरी रेप केस में बड़ा मोड़; 'पेनिट्रेशन' साबित न होने पर हाईकोर्ट ने इसे 'बलात्कार का प्रयास' माना
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने धमतरी के 20 साल पुराने रेप केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी की सजा 7 साल से घटाकर 3.5 साल कर दी है। कोर्ट ने 'पेनिट्रेशन' साबित न होने पर इसे 'रेप के प्रयास' का मामला माना है।Puja Sahu
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने दो दशक पुराने एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण देते हुए आरोपी की सजा को आधा कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मेडिकल साक्ष्यों में 'पेनिट्रेशन' (प्रवेश) साबित नहीं होता है, तो उसे बलात्कार के बजाय 'बलात्कार के प्रयास' की श्रेणी में रखा जाएगा।
क्या था मामला?
यह मामला धमतरी जिले का है, जो 21 मई 2004 को घटित हुआ था। पीड़िता उस समय घर पर अकेली थी, जब आरोपी ने उसे बहला-फुसलाकर अपने घर बुलाया। वहां आरोपी ने पीड़िता के हाथ-पैर बांधकर और मुंह में कपड़ा ठूंसकर उसके साथ जबरन यौन कृत्य किया।
निचली अदालत का फैसला:
अप्रैल 2005 में धमतरी की अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने आरोपी को IPC की धारा 376(1) (रेप) के तहत दोषी माना था और उसे 7 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने क्यों बदली सजा?
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। 16 फरवरी 2026 को दिए अपने फैसले में कोर्ट ने साक्ष्यों का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया:
पेनिट्रेशन का अभाव: कोर्ट ने पाया कि मेडिकल रिपोर्ट और पीड़िता के बयानों में विरोधाभास था। जिरह के दौरान पूर्ण पेनिट्रेशन की पुष्टि नहीं हो सकी।
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कानूनी परिभाषा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बलात्कार के अपराध को सिद्ध करने के लिए 'पेनिट्रेशन' एक अनिवार्य तत्व है। केवल 'डिस्चार्ज' (वीर्य का पाया जाना) बलात्कार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है, यदि प्रवेश साबित न हो।
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अपराध की प्रकृति: कोर्ट ने माना कि आरोपी का इरादा स्पष्ट रूप से गलत था और यह एक 'हिंसक यौन हमला' था, इसलिए इसे धारा 376 के साथ धारा 511 (अपराध करने का प्रयास) के तहत रखा गया।
भावनाओं से नहीं, साक्ष्य से चलता है कानून'
अदालत ने इस फैसले के माध्यम से एक नजीर पेश की है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि बलात्कार एक अत्यंत गंभीर अपराध है, लेकिन न्याय व्यवस्था केवल भावनाओं पर आधारित नहीं हो सकती। कानूनी तत्वों और परिभाषाओं का पूरा होना अनिवार्य है।
वर्तमान में आरोपी जमानत पर बाहर है। हाईकोर्ट ने उसे 2 महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का आदेश दिया है। यदि वह निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करता, तो पुलिस उसे गिरफ्तार कर जेल भेजेगी।
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