रिश्ता मर्जी का, आरोप दुष्कर्म का? हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर ट्रायल कोर्ट के आदेश पर लगाई मुहर
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी की दोषमुक्ति बरकरार रखी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि एक वयस्क और विवाहित महिला अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाती है, तो उसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। पीड़िता की अपील को खारिज करते हुए अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।Puja Sahu
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए आरोपी की दोषमुक्ति के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि एक बालिग और शादीशुदा महिला अपनी मर्जी और सहमति से शारीरिक संबंध बनाती है, तो उसे दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस की बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए पीड़िता की अपील करने की अनुमति वाली याचिका को ठुकरा दिया।
क्या था पूरा मामला?
मामला बेमेतरा जिले का है। याचिकाकर्ता महिला एक एग्रीकल्चरल कॉलेज में मजदूरी का काम करती थी। उसकी शिकायत के अनुसार, वहीं काम करने वाले गांव के ही एक व्यक्ति (आरोपी) ने उसे शादी का झांसा देकर प्रेम जाल में फंसाया। महिला का आरोप था कि 25 जुलाई 2022 की सुबह जब वह शौच के लिए जा रही थी, तब आरोपी ने उसे शादी का वादा कर बहलाया और अपने घर ले जाकर उसके साथ संबंध बनाए।
महिला ने अपनी शिकायत में यह भी बताया कि घटना के वक्त वह पहले से तीन माह की गर्भवती थी। लोक-लाज के डर से उसने शुरुआत में किसी को कुछ नहीं बताया, लेकिन बाद में पति को जानकारी होने पर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई।
ट्रायल कोर्ट ने किया था बरी
पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर चालान पेश किया था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयानों और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को दोषमुक्त कर दिया था। इसी फैसले को चुनौती देने और अपील की अनुमति मांगने के लिए पीड़िता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान साक्ष्यों का बारीकी से अवलोकन किया और निम्नलिखित बिंदुओं को आधार बनाया:
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सहमति और डर का अभाव: कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने पीड़िता को जान से मारने या चोट पहुंचाने की धमकी देकर संबंध बनाए थे।
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वैवाहिक स्थिति: पीड़िता पहले से शादीशुदा थी और गर्भवती भी थी। ऐसे में "शादी के झूठे वादे" के आधार पर दी गई सहमति का तर्क यहां प्रभावी नहीं पाया गया, क्योंकि वह कानूनी रूप से आरोपी से शादी करने की स्थिति में नहीं थी।
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बालिग होना: रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता बालिग थी और अपनी सहमति व्यक्त करने में सक्षम थी।
अदालत का निष्कर्ष:
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि गवाहों और पीड़िता के बयानों से यह साफ झलकता है कि शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बनाए गए थे। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि एक वयस्क महिला द्वारा स्वेच्छा से बनाए गए संबंधों को बाद में रेप का जुर्म नहीं माना जा सकता। इसी के साथ अदालत ने ट्रायल कोर्ट के दोषमुक्ति के आदेश को बरकरार रखा।
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