छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: डीपी विप्र कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर सोनल तिवारी की बर्खास्तगी रद्द, 'फुल बैक वेज' के साथ बहाली का आदेश
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने डीपी विप्र कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर सोनल तिवारी की बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए बहाली का आदेश दिया है। कोर्ट ने 2019 से अब तक का पूरा वेतन और लाभ देने का निर्देश दिया, क्योंकि प्रबंधन ने यूनिवर्सिटी की मंजूरी के बिना कार्रवाई की थी।Puja Sahu
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने शिक्षा जगत से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने बिलासपुर के डीपी विप्र कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर सोनल तिवारी की बर्खास्तगी को पूरी तरह अवैध करार दिया है। जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू की एकल पीठ ने न केवल उन्हें तत्काल सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है, बल्कि साल 2019 से अब तक का पूरा वेतन और अन्य लाभ देने का भी निर्देश दिया है।
क्या था पूरा मामला?
असिस्टेंट प्रोफेसर सोनल तिवारी के खिलाफ यह विवाद साल 2018 में शुरू हुआ था:
निलंबन: तत्कालीन प्रिंसिपल की शिकायत के आधार पर उन्हें 2018 में सस्पेंड कर दिया गया था।
सेवा समाप्ति: 14 मई 2019 को कॉलेज की गवर्निंग बॉडी ने एक कड़ा फैसला लेते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं।
कानूनी लड़ाई: सोनल तिवारी ने पहले इस फैसले को यूनिवर्सिटी में चुनौती दी, लेकिन वहां से राहत न मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने क्यों माना बर्खास्तगी को अवैध?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि कॉलेज प्रबंधन ने प्रक्रियात्मक नियमों की भारी अनदेखी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
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यूनिवर्सिटी की मंजूरी अनिवार्य: नियमों के तहत किसी भी शिक्षक को हटाने से पहले यूनिवर्सिटी की कार्यकारिणी परिषद की पूर्व अनुमति आवश्यक है।
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नियमों का उल्लंघन: सोनल तिवारी के मामले में कॉलेज प्रबंधन ने ऐसी कोई मंजूरी नहीं ली थी, जो कानूनी रूप से अनिवार्य थी। इसी आधार पर कोर्ट ने प्रबंधन के तर्कों को खारिज कर दिया।
'नो वर्क नो पे' का नियम यहाँ लागू नहीं
आमतौर पर 'काम नहीं तो वेतन नहीं' की बात कही जाती है, लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
"यदि कर्मचारी की कोई गलती न हो और उसे जबरन काम से दूर रखा गया हो, तो वह पूर्ण वेतन का हकदार है।"
सोनल तिवारी ने कोर्ट के सामने अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) पेश कर यह साबित किया कि बर्खास्तगी की अवधि के दौरान वे किसी अन्य संस्थान में कार्यरत नहीं थीं और उनकी आय का कोई दूसरा साधन नहीं था।
फैसले का महत्व
यह फैसला शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन के लिए एक कड़ा संदेश है कि वे किसी भी कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं और यूनिवर्सिटी के नियमों की अनदेखी नहीं कर सकते।
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