लिव-इन रिलेशनशिप पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 'पसंद का पार्टनर चुनना मौलिक अधिकार, परिवार का हस्तक्षेप गलत'
दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बालिगों को पुलिस सुरक्षा के निर्देश। कोर्ट ने कहा कि अपनी पसंद का पार्टनर चुनना अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है और इसमें परिवार का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जानें क्या है पूरा मामला और लिव-इन जोड़ों के कानूनी अधिकार।Puja Sahu
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि दो बालिग व्यक्ति आपसी सहमति से साथ रहना चाहते हैं, तो यह उनकी निजी पसंद का मामला है और इसमें परिवार या किसी अन्य व्यक्ति का हस्तक्षेप कानूनन अनुचित है।
"पसंद का साथी चुनना मौलिक अधिकार"
जस्टिस सौरभ बनर्जी की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अपनी मर्जी से जीवनसाथी या पार्टनर चुनना भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। अदालत ने जोर देकर कहा कि बालिगों को अपनी जिंदगी के फैसले लेने की पूरी आजादी है और समाज या परिवार उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक युवा जोड़े से जुड़ा है, जो साल 2024 से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। याचिकाकर्ता युवती ने कोर्ट को बताया कि उसके पिता और रिश्तेदार इस रिश्ते के खिलाफ हैं और उन्हें जान से मारने की धमकियां दे रहे हैं।
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उम्र का विवरण: वकील के अनुसार, युवक और युवती का जन्म क्रमशः 2006 और 2007 में हुआ है, जिससे वे वर्तमान में बालिग की श्रेणी में आते हैं।
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कानूनी समझौता: जोड़े ने 17 फरवरी को अपने रिश्ते को लेकर एक औपचारिक समझौता भी किया था।
युवती ने अपनी और अपने पार्टनर की जान को खतरा बताते हुए कोर्ट से सुरक्षा की गुहार लगाई थी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया।
कोर्ट के महत्वपूर्ण बिंदु
अदालत ने सुनवाई के दौरान कुछ कड़े और स्पष्ट निर्देश दिए:
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पुलिस सुरक्षा के निर्देश: कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि इस जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और परिवार की ओर से मिलने वाली किसी भी धमकी पर तत्काल कार्रवाई हो।
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शादी जैसा रिश्ता: बेंच ने टिप्पणी की कि हालांकि लिव-इन को कानूनी रूप से विवाह का दर्जा प्राप्त नहीं है, लेकिन यह एक तरह से 'शादी जैसा रिश्ता' ही है।
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विविधता का सम्मान: कोर्ट ने कहा कि भारत में विवाह या साथ रहने की मान्यता दो लोगों की सहमति पर निर्भर है, चाहे उनकी जाति, धर्म, रंग या पंथ कुछ भी हो।
"जब दो बालिग अपनी मर्जी से साथ रहने का फैसला करते हैं, तो परिवार या समाज को उन पर दबाव डालने या धमकी देने का कोई कानूनी हक नहीं है।" — दिल्ली हाईकोर्ट
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की स्थिति
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानून धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट होता जा रहा है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत लंबे समय तक लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को कुछ कानूनी अधिकार और सुरक्षा प्रदान की जाती है। यह फैसला उसी दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है।
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