मोस्ट वांटेड कमांडर पापा राव ने 17 साथियों संग किया सरेंडर, कहा- "बंदूक का कोई भविष्य नहीं"
बस्तर के मोस्ट वांटेड नक्सली कमांडर पापा राव ने 17 साथियों के साथ किया सरेंडर। उन्होंने बताया क्यों अब बंदूक की लड़ाई का कोई भविष्य नहीं और कैसे बदल रहा है बस्तर का भूगोल।Puja Sahu
जगदलपुर : छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ जारी अभियान को एक बड़ी और ऐतिहासिक सफलता मिली है। दशकों तक जंगलों में आतंक का पर्याय रहे मोस्ट वांटेड सीनियर नक्सली कमांडर पापा राव ने आखिरकार हिंसा का रास्ता त्याग दिया है। 24 मार्च को एक बड़े घटनाक्रम में पापा राव ने अपने 17 साथियों के साथ सुरक्षा बलों के सामने हथियार डाल दिए।
मुख्यधारा में लौटने से पहले पापा राव ने संगठन की अंदरूनी कलह, टूटती रणनीतियों और लोकतंत्र पर दोबारा जागते भरोसे को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए।
10 दिनों तक चला 'खुद से युद्ध'
पापा राव ने बताया कि हथियार डालने का फैसला रातों-रात नहीं लिया गया। समर्पण करने से पहले वह करीब 10 दिनों तक मानसिक कशमकश और आत्मग्लानि से जूझता रहा। उसने स्वीकार किया कि जिस लड़ाई को वे आदिवासियों के हित में बता रहे थे, उसने वास्तव में आम जनता का ही सबसे ज्यादा नुकसान किया है।
"मैंने खुद से जंग लड़ी और महसूस किया कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा बंदूक से नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक तरीके से ही संभव है।" - पापा राव
"डर नहीं, समझदारी है यह फैसला"
अक्सर नक्सली सरेंडर को दबाव या डर का नतीजा माना जाता है, लेकिन पापा राव ने इसे 'समझदारी' करार दिया। उसने बदले हुए हालात का जिक्र करते हुए कहा कि अब बस्तर का भूगोल पूरी तरह बदल चुका है।
- बढ़ते सुरक्षा कैंप: अंदरूनी इलाकों में सुरक्षा बलों की पैठ मजबूत हुई है।
- सिमटता जंगल: लगातार बढ़ते कैंपों के कारण माओवादियों के छिपने और रणनीति बनाने की जगह खत्म हो रही है।
- कमजोर रणनीति: आधुनिक युद्ध कौशल के सामने माओवादी नीतियां अब बेअसर साबित हो रही हैं।
देवजी के बाद टूटा भ्रम
शीर्ष माओवादी नेता देवजी का जिक्र करते हुए पापा राव ने बताया कि देवजी के जाने के बाद उसने बस्तर की कमान संभालने का सपना देखा था। लेकिन समय और हालात ने उसे हकीकत का आईना दिखा दिया। उसने साफ शब्दों में कहा कि बंदूक की लड़ाई का अब कोई भविष्य शेष नहीं रह गया है।
जंगल में सक्रिय साथियों से अपील
समाज की मुख्यधारा से जुड़ने के बाद पापा राव ने अपने उन साथियों से भी जंगल छोड़ने की अपील की है जो अभी भी संगठन का हिस्सा हैं। उसने संदेश दिया कि असली लड़ाई संविधान के दायरे में रहकर ही जीती जा सकती है और विकास की दौड़ में शामिल होने के लिए हथियार छोड़ना ही एकमात्र रास्ता है।
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