नक्सलवाद को ठिकाने लगा दिया गया: अमित शाह
राजनीतिक रूप से अत्यधिक व्यस्तता वाले वर्ष के बावजूद माओवादी उग्रवाद को निर्णायक रूप से कुचलना केंद्रीय गृह मंत्री की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।Puja Sahu
राजनीतिक रूप से अत्यधिक व्यस्तता वाले वर्ष के बावजूद माओवादी उग्रवाद को निर्णायक रूप से कुचलना केंद्रीय गृह मंत्री की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।
वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादी उग्रवाद को ‘देश के सामने सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती’ करार दिया था। दो दशक बीतने के बाद इस चुनौती को जड़ से समाप्त करने की जिम्मेदारी अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में आगे बढ़ी है। कभी देश के लगभग 160 जिलों में प्रभाव रखने वाला माओवादी आंदोलन अब सिमटकर केवल 11 जिलों तक सीमित रह गया है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अक्तूबर 2025 के ताजा आकलन के अनुसार, छत्तीसगढ़ के आपस में जुड़े तीन जिले—सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर—ही अब ‘अत्यधिक प्रभावित’ श्रेणी में रह गए हैं। स्पष्ट रूप से 2025 में माओवादी आंदोलन की जड़ों को निर्णायक रूप से कुचलना अमित शाह की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में उभरा है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक यह भी रेखांकित करते हैं कि इसी अवधि में भाजपा को दिल्ली और बिहार जैसे दो बड़े राज्यों में चुनावी जीत दिलाने में शाह की रणनीतिक भूमिका अहम रही।
2024 की शुरुआत में ही अमित शाह ने सुरक्षा एजेंसियों के लिए स्पष्ट समयसीमा तय करते हुए घोषणा की थी कि 31 मार्च 2026 तक देश से माओवाद का पूरी तरह सफाया कर दिया जाएगा। इसके बाद छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ व्यापक अभियान तेज किया गया। यह राज्य तब भी माओवादियों का मजबूत गढ़ बना हुआ था, जबकि ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे पड़ोसी राज्यों में यह आंदोलन कमजोर पड़ चुका था।
नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार के लिए शाह लंबे समय से लगातार प्रयास करते रहे हैं। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि पिछले छह वर्षों में माओवाद के मुद्दे पर उन्होंने 85 से अधिक बैठकें कीं, जिनमें से कई पूरे दिन चलीं। इससे सुरक्षा बलों और प्रशासन को यह स्पष्ट संदेश मिला कि यह अभियान आर-पार की लड़ाई है। अतिरिक्त बलों की तैनाती, आधुनिक हथियारों, ड्रोन, बख्तरबंद वाहनों, तकनीक और मानवीय खुफिया तंत्र को मजबूत कर इस रणनीति को जमीन पर उतारा गया।
माओवादी प्रभावित इलाकों में सुरक्षा ढांचे को मजबूत करते हुए पुलिस थानों की संख्या 2014 में 66 से बढ़कर 2024 में 612 तक पहुंच गई। सबसे अहम बदलाव यह रहा कि फील्ड कमांडरों को जोखिम उठाने और स्वतंत्र रूप से अभियान चलाने की पूरी छूट दी गई। खुफिया सूत्रों के अनुसार दिसंबर 2023 में छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन—कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार के स्थान पर भाजपा सरकार का गठन—भी इस सफलता में एक निर्णायक कारक साबित हुआ।
माओवादी विरोधी अभियानों का प्रभाव व्यापक रहा। वर्ष 2014 में छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का प्रभाव लगभग 18,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में था, जो अब घटकर करीब 3,000 वर्ग किलोमीटर रह गया है। सुरक्षाकर्मियों और नागरिकों की मौतों में भी दशक दर दशक 70 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई है।
समन्वित प्रयासों के नतीजे 2024 में स्पष्ट रूप से सामने आए, जब उस वर्ष छत्तीसगढ़ में 217 माओवादी मारे गए। 2025 में नवंबर के अंत तक यह संख्या बढ़कर 234 हो गई। मारे गए उग्रवादियों में भाकपा (माओवादी) के महासचिव बसवराजु और केंद्रीय समिति के चार अन्य सदस्य शामिल थे। इसके अलावा, शीर्ष फील्ड कमांडर माडवी हिडमा भी आंध्र प्रदेश पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया।
आंदोलन के कमजोर पड़ने से बड़ी संख्या में माओवादियों ने आत्मसमर्पण का रास्ता अपनाया। महाराष्ट्र में शीर्ष कमांडर भूपति और छत्तीसगढ़ में रूपेश के नेतृत्व वाले समूहों ने हथियार डाल दिए। 2024 में छत्तीसगढ़ में 800 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 1,500 से ज्यादा हो गई, जो सुरक्षा बलों की कार्रवाई की प्रभावशीलता को दर्शाता है।
लगभग तीन दशकों तक गृह मंत्री पद पर रहे अमित शाह (30 मई 2019 से) को माओवादी आंदोलन के लगभग सफाए के लिए व्यापक स्तर पर सकारात्मक मूल्यांकन मिलना स्वाभाविक है। हालांकि अप्रैल 2025 में पहलगाम में पर्यटकों पर हमला और नवंबर में लाल किले के पास कार बम विस्फोट जैसी घटनाएं सुरक्षा चूक के रूप में सामने आईं, फिर भी समग्र रूप से यह वर्ष देश के दूसरे सबसे शक्तिशाली भाजपा नेता माने जाने वाले अमित शाह के लिए काफी हद तक सकारात्मक रहा।
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