इतिहास में पहली बार: मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्षी दल लामबंद
भारतीय इतिहास में पहली बार, विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। जानें क्या है पूरा मामला और क्या है इसे हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया।Puja Sahu
नई दिल्ली | भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार किसी मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उनके पद से हटाने की तैयारी की जा रही है। विपक्षी दलों का 'इंडिया' गठबंधन मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में हटाने का प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस देने की योजना बना रहा है। सूत्रों के अनुसार, इस नोटिस का मसौदा तैयार हो चुका है और इसे इसी सप्ताह संसद के पटल पर रखा जा सकता है।
ममता बनर्जी ने मोर्चा खोला, कांग्रेस का मिला साथ
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयानों से हुई। उन्होंने राज्य में S.I.R. के मुद्दे पर मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटे जाने पर कड़ा ऐतराज जताया था। ममता बनर्जी ने स्पष्ट रूप से ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की थी। तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद के मुताबिक, कांग्रेस सहित गठबंधन के अन्य प्रमुख दल भी इस नोटिस का पुरजोर समर्थन करेंगे।
दूसरी ओर, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान कानून-व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
कैसे हटते हैं मुख्य निर्वाचन आयुक्त? (संवैधानिक प्रक्रिया)
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उनके पद से हटाना कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है। भारत के संविधान के अनुसार, उन्हें हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के समान ही जटिल है।
हटाने के मुख्य आधार:
- सिद्ध कदाचार (गलत व्यवहार)
- अक्षमता (अयोग्यता)
संसद में प्रक्रिया का चरण:
- नोटिस और हस्ताक्षर: यह प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में लाया जा सकता है। लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है।
- जांच समिति: नोटिस मिलने के बाद एक समिति आरोपों की जांच करती है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तभी इसे चर्चा के लिए सूचीबद्ध किया जाता है।
- विशेष बहुमत: इस प्रस्ताव को पारित करने के लिए संसद में 'विशेष बहुमत' की आवश्यकता होती है, जिसमें सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) बहुमत जरूरी है।
यदि यह प्रस्ताव संसद में पेश होता है, तो यह देश के संसदीय इतिहास में अपनी तरह का पहला मामला होगा।
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