अटूट आस्था का केंद्र बना 'भक्त प्रह्लाद धाम', होलिका दहन के साथ जुड़ी है संतान प्राप्ति की अनोखी परंपरा
रायपुर के जोरापारा स्थित भक्त प्रह्लाद धाम में होली पर निभाई जाती है एक अनोखी परंपरा। यहाँ होलिका दहन के बाद सुरक्षित निकली भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा को घर ले जाने से निसंतान दंपतियों को 'संतान सुख' की प्राप्ति होती है। जानिए 30 सालों से चली आ रही इस अटूट आस्था की पूरी कहानी।Puja Sahu
रायपुर : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में होली का पर्व केवल रंगों और हुड़दंग का त्योहार नहीं है, बल्कि यह गहरी आस्था और विश्वास का भी प्रतीक है। शारदा चौक के पास जोरापारा स्थित 'भक्त प्रह्लाद धाम' अपनी एक ऐसी ही अनूठी परंपरा के लिए देशभर में चर्चित है, जहाँ निसंतान दंपती 'संतान सुख' की कामना लेकर पहुंचते हैं।
अग्नि के बीच से सुरक्षित निकाली जाती है प्रह्लाद की प्रतिमा
जोरापारा में करीब एक सदी से होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है। यहाँ लकड़ियों के ढेर पर होलिका और भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा स्थापित की जाती है। परंपरा के अनुसार, जैसे ही अग्नि प्रज्वलित होती है, होलिका की प्रतिमा तो जल जाती है, लेकिन भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा को धधकती आग के बीच से सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाता है। मान्यता है कि यह प्रतिमा साक्षात आशीर्वाद का रूप है।
30 सालों से जारी है 'गोद भराई' की रस्म
इस धाम की सबसे खास बात यहाँ होने वाली ‘गोद भराई’ की रस्म है। मान्यता है कि होलिका दहन के बाद सुरक्षित निकाली गई प्रह्लाद की प्रतिमा को यदि निसंतान दंपती कुछ समय के लिए अपने शयनकक्ष (Bedroom) में रखें, तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है।
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शुरुआत: इस परंपरा की शुरुआत साल 1992 में हुई थी, जब पहली बार एक दंपती को यह प्रतिमा दी गई और शादी के 18 साल बाद उनके घर किलकारी गूंजी।
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सफलता का दावा: समिति का दावा है कि अब तक 300 से ज्यादा परिवारों को इस परंपरा के माध्यम से संतान सुख मिल चुका है। भारी मांग: इस प्रतिमा को घर ले जाने के लिए भक्तों को पहले से समिति के पास अपना नंबर लगवाना पड़ता है।
सात राज्यों से पहुंचते हैं श्रद्धालु
भक्त प्रह्लाद धाम की ख्याति अब केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। यहाँ महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। होली के बाद यह प्रतिमा बारी-बारी से परिवारों को सौंपी जाती है और करीब एक महीने बाद इसे वापस लाकर अगले साल के लिए तैयार किया जाता है।
इस सोमवार को यहाँ 'गोद भराई' की विशेष रस्म का आयोजन किया जाएगा। समिति की महिलाएं लाल कपड़े में प्रह्लाद की तस्वीर, नारियल, सिक्का और चावल भेंट कर दंपतियों को कुछ समय के लिए प्रतिमा गोद में रखने का सौभाग्य प्रदान करेंगी।
एक सदी पुरानी यह परंपरा आज उम्मीद और विश्वास का सबसे बड़ा केंद्र बन चुकी है, जहाँ हर साल सैकड़ों जोड़े झोली भरने की आस लिए बाबा प्रह्लाद की शरण में आते हैं।
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