मासिक धर्म स्वच्छता अब 'मौलिक अधिकार': देश के सभी स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त मिलेंगे सेनेटरी पैड।
उच्चतम न्यायालय ने मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील रुख अपनाया है। कोर्ट का मानना है कि यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि महिलाओं की गरिमा और शिक्षा के अधिकार से जुड़ा विषय है।Puja Sahu
नई दिल्ली: भारतीय सुप्रीम कोर्ट माहवारी स्वच्छता (Menstrual Hygiene) को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। देश की करोड़ों बेटियों के पक्ष में एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए SC ने स्पष्ट किया है कि मासिक धर्म स्वच्छता केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 21A (मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार) का अभिन्न हिस्सा माना है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने यह फैसला मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस नेता जया ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनाया।
"बेटियों, यह तुम्हारी गलती नहीं है"
अदालत ने इस दौरान बेहद संवेदनशील और भावुक टिप्पणी की। कोर्ट ने उन सभी लड़कियों को संबोधित करते हुए कहा जिन्हें मासिक धर्म के कारण 'अशुद्ध' माना गया या जिन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा— "बेटियों, ये तुम्हारी गलती नहीं है।" कोर्ट ने जोर देकर कहा कि शिक्षा एक 'मल्टीप्लायर राइट' है, और यदि स्वच्छता सुविधाओं की कमी के कारण लड़कियां स्कूल नहीं जा पा रही हैं, तो यह उनकी गरिमा और निजता का सीधा उल्लंघन है।
कोर्ट के प्रमुख निर्देश: अब क्या बदलेगा?
कोर्ट ने केंद्र, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जो सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों पर लागू होंगे।
- मुफ्त सेनेटरी नैपकिन: कक्षा 6 से 12 तक की सभी छात्राओं को उच्च सुरक्षा मानकों वाले बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन मुफ्त प्रदान किए जाएंगे।
- बुनियादी सुविधाएं: हर स्कूल में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय, पर्याप्त पानी, साबुन और हैंडवॉश की व्यवस्था अनिवार्य होगी।
- MHM कॉर्नर: स्कूलों में 'मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन' (MHM) कॉर्नर बनाए जाएंगे, जहाँ जरूरत पड़ने पर छात्राओं को अतिरिक्त यूनिफॉर्म, इनरवियर और डिस्पोजेबल बैग मिल सकें।
- अपशिष्ट प्रबंधन: सेनेटरी वेस्ट के निपटान के लिए उचित और वैज्ञानिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
- जागरूकता अभियान: छात्रों, शिक्षकों और स्टाफ के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे ताकि मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक भ्रांतियों को दूर किया जा सके।
सामाजिक और संस्थागत बाधाओं का अंत
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी बाधाओं को दूर करे जो लड़कियों को शिक्षा से दूर करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाओं के अभाव के कारण बड़ी संख्या में लड़कियां हर महीने स्कूल से अनुपस्थित रहती हैं या पढ़ाई छोड़ देती हैं। यह फैसला न केवल उनके प्रजनन स्वास्थ्य की रक्षा करेगा, बल्कि उन्हें पुरुषों के समान शैक्षिक अवसर भी प्रदान करेगा। यह सुनिश्चित करता है कि प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रियाओं के कारण किसी भी बेटी का भविष्य अंधकार में न रहे।
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