सिम्स के डॉक्टरों का कमाल: गला कटी हालत में पहुंचे 26 वर्षीय युवक को दिया जीवनदान, 5 परतों में जोड़ी श्वासनली
बिलासपुर सिम्स के डॉक्टरों ने गले की जानलेवा चोट (लैरिंगोट्रेकियल इंजरी) से जूझ रहे 26 वर्षीय युवक का 2 घंटे चले जटिल ऑपरेशन में 5 परतों में श्वासनली जोड़कर जीवनदान दिया। पढ़ें पूरी खबर।Puja Sahu
बिलासपुर : बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) के डॉक्टरों ने अपनी विशेषज्ञता, त्वरित निर्णय क्षमता और बेहतरीन टीमवर्क का परिचय देते हुए एक 26 वर्षीय युवक की जान बचाने में बड़ी सफलता हासिल की है। गले में गंभीर और जानलेवा चोट के साथ अस्पताल पहुंचे इस युवक का आपातकालीन ऑपरेशन कर न केवल उसकी सांसों को सुरक्षित किया गया, बल्कि उसकी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी श्वासनली की सफल मरम्मत भी की गई। चिकित्सकों की इस कामयाबी ने एक बार फिर सिम्स की आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की दक्षता को साबित किया है।
सांसें थमने की कगार पर थीं, श्वासनली से आ-जा रही थी हवा
मिली जानकारी के अनुसार, शादाब खान को बेहद नाजुक हालत में सिम्स के कैजुअल्टी विभाग में लाया गया था। मरीज के गले में गहरा खुला घाव था और श्वासनली कट जाने के कारण वह सांस नहीं ले पा रहा था। स्थिति इतनी भयावह थी कि घाव के खुले हिस्से से हवा का स्पष्ट आवागमन हो रहा था। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस प्रकार की चोट को लैरिंगोट्रेकियल इंजरी (Laryngotracheal Injury) कहा जाता है।
मरीज के शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिर रहा था। खतरे को भांपते हुए ईएनटी विभागाध्यक्ष व प्रोफेसर डॉ. आरती पाण्डेय, सह प्राध्यापक विद्याभूषण साहू और सहायक प्राध्यापक डॉ. श्वेता मित्तल ने तुरंत स्थिति का आकलन किया और बिना समय गंवाए मरीज को सीधे आपातकालीन ऑपरेशन थिएटर ले जाने का फैसला किया। डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मरीज के श्वास मार्ग को जल्द से जल्द बहाल करना था, क्योंकि चंद मिनटों की भी देरी जानलेवा हो सकती थी।
ट्रेकियोस्टॉमी कर सुरक्षित किया श्वास मार्ग, 2 घंटे चली जटिल सर्जरी
ऑपरेशन थिएटर में पहुंचते ही डॉक्टरों ने सबसे पहले आपातकालीन ट्रेकियोस्टॉमी (गले में छोटा छेद कर श्वास नली को सीधे बाहर से जोड़ना) की। इससे मरीज का श्वास मार्ग सुरक्षित हुआ और उसका गिरता ऑक्सीजन लेवल सामान्य स्थिति में आ सका। इसके बाद शुरू हुई श्वासनली को फिर से जोड़ने की अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण सर्जरी।
लगभग दो घंटे तक चले इस बेहद बारीक ऑपरेशन में डॉक्टरों ने अपनी सूक्ष्म तकनीक और धैर्य का परिचय देते हुए श्वासनली, उसके ऊपर की मांसपेशियों, फैशियल लेयर और त्वचा को क्रमशः पांच अलग-अलग परतों में जोड़कर मरम्मत की।
न्यूरोसर्जन न होने के कारण रायपुर रेफर
गले की सफल सर्जरी के बाद जब मरीज की आगे की जांचें की गईं, तो पता चला कि उसके सिर की हड्डी में भी कई जगहों पर फ्रैक्चर हैं। सीटी स्कैन की रिपोर्ट में मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव के लक्षण भी मिले। चूंकि सिम्स में फिलहाल न्यूरोसर्जन की सुविधा उपलब्ध नहीं थी, इसलिए डॉक्टरों ने मरीज की हालत को पूरी तरह स्थिर करने के बाद उसे आगे के इलाज के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (मेकाहारा), रायपुर रेफर कर दिया, जहां फिलहाल उसका इलाज जारी है।
एनेस्थीसिया विभाग और ईएनटी टीम के समन्वय से बची जान
इस जीवनरक्षक सर्जरी को सफल बनाने में एनेस्थीसिया विभाग ने रीढ़ की हड्डी की तरह काम किया। एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष व प्रोफेसर डॉ. मधुमिता मूर्ति और सहायक प्राध्यापक डॉ. प्रशांत कुमार पैंकरा के नेतृत्व में टीम ने पूरे ऑपरेशन के दौरान मरीज की नाजुक स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित और सुरक्षित बनाए रखा। ईएनटी, सर्जरी और एनेस्थीसिया विभागों के इसी आपसी तालमेल ने इस नामुमकिन से दिखने वाले मामले को सफलता में बदल दिया।
"मरीज जब अस्पताल पहुंचा था, तब उसकी स्थिति अत्यंत गंभीर और चिंताजनक थी। हमारी टीम ने त्वरित निर्णय लेकर काम किया, जिससे उसकी जान बचाई जा सकी।" — डॉ. आरती पाण्डेय, ईएनटी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर
सिम्स की दक्षता का उत्कृष्ट उदाहरण: डीन
सिम्स के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने इस बड़ी सफलता पर डॉक्टरों की पूरी टीम को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह मामला सिम्स के डॉक्टरों की दक्षता, उनके समर्पण और संकट के समय तुरंत सही निर्णय लेने की क्षमता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। गंभीर परिस्थितियों में समय पर मिलने वाला सटीक इलाज ही मरीज का जीवन बचाता है और सिम्स लगातार आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के जरिए प्रदेश के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए प्रतिबद्ध है।
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