तीजन बाई की अनसुनी कहानी: इंदिरा गांधी से बेबाक संवाद और पेरिस से आया सम्मान
रायपुर. छत्तीसगढ़ की सबसे गूंजती आवाज तेज बारिश, बादलों की गर्जना के बीच 4-5 जुलाई की दरम्यानी रात करीबBhupesh Tandiya
रायपुर. छत्तीसगढ़ की सबसे गूंजती आवाज तेज बारिश, बादलों की गर्जना के बीच 4-5 जुलाई की दरम्यानी रात करीब 3:15 मिनट पर हमेशा के लिए चुप हो गई. महाभारत की कथाओं को अपनी भर्राई, करुण और ओज से भरी आवाज़ में जीवित कर देने वाली पंडवानी गायिका तीजन बाई अब नहीं रहीं. दुनिया उन्हें तीजन बाई के नाम से जानती थी, हम उन्हें तीजन दाई कहते थे. दाई मतलब मां...छत्तीसगढ़ की वो मां, जिसने गांवों की पगडंडियों से लेकर देश-दुनिया बड़े शहरों के सभागारों तक, महाभारत की कथाओं को अपनी भर्राई, करुण और ओज से भरी आवाज़ में जीवित कर देती थी. हाथ में तंबूरा लेकर पूरी दुनिया को छत्तीसगढ़ की लोक आत्मा से परिचित कराने वाली वह पहली महिला कलाकार थीं, जिन्होंने न केवल एक लोककला को पुनर्जीवित किया, बल्कि उसे देश-दुनिया के मंचों तक पहुंचाया.
अगस्त 2014 की बात है, फिल्म अभिनेमा रणबीर कपूर और निर्देशक इम्तियाज अली तीजन दाई से मिलने भिलाई के सेक्टर-1 स्थित उनके घर पहुंचे. वे अपनी एक फिल्म में पंडवानी से जुड़ा कोई हिस्सा रखना चाहते थे. इस मुलाकात के करीब 30 मिनट बाद मैं उनसे मिला. बातचीत में उन्होंने कहा कि मैं अनपढ़, कभी स्कूल नहीं गई, जिंदगी के इस पड़ाव में आकर किसी तरह अपना नाम लिखना सीखा, लेकिन कई विश्वविद्यालयों ने मुझे पीएचडी की मानद दी. गरीबी में जिंदगी का सफर बढ़ता गया, लेकिन भारत के बड़े-बड़े शहरों के साथ 5 से ज्यादा देशों के कई शहरों में घूम आई हूं. पद्मश्री, पद्मविभूषण जैसा बड़ा सम्मान मिल चुका है, सरकारी नौकरी है. उन्होंने छत्तीसगढ़ी में कहा- 'मोर बर त इही सरग हे' (मेरे लिए तो यही स्वर्ग है)..मैंने मुस्कुराते हुए कहा- दाई त आपमन नाम के आगु सरगवासी काबर नहीं लिखथो..वो मेरे पीठ पर जोर से एक ठपका लगाते हुए हंसने लगीं. कुछ देर हंसने के बाद बोलीं, कहत त बने हस, एकदम अनोखा हो जाई नइ...
कुछ बिरले ही होते हैं, जिनके जीवन के हर पड़ाव पर अलग-अलग शोध किया जा सकता है. तीजन दाई के जीवन के कई अनोखे किस्से हैं, जब कभी फुर्सत में मिलीं, हर किस्से को नए अंदाज में सुनातीं. तारीख और साल उन्हें कभी याद नहीं रहता, लेकिन घटनाएं याद रहतीं, वे बतातीं कि दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक प्रस्तुति के उनसे कहा- “आप बहुत अच्छा महाभारत करती हैं.” इस पर उन्होंने तुरंत मुस्कराकर इंदिरा गांधी को टोंका जवाब दिया- “मैडम मैं महाभारत नहीं करती हूं, महाभारत की कथा सुनाती हूं.”
साल 1985-86 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित भारत महोत्सव में तीजन दाई ने पंडावनी की प्रस्तुति दी. संभवत: इसके एक साल बाद फ्रांस की राजधानी पेरिस से एक चिट्ठी भारत भेजी गई. लिफाफे पर न गांव का नाम था, न डाकघर, न जिला और न ही पूरा पता, केवल लिखा था- Teejan Bai, India. हैरान करने वाली ही बात है कि वह चिट्ठी अपने सही ठिकाने तक पहुंच गई. यह घटना एक लोक कलाकार की प्रसिद्धि का प्रमाण थी, जिसे एक अनपढ़ लोक कलाकार ने अपनी प्रतिभा से अर्जित किया था.
हिंदी के प्रसिद्ध कवि भगवत रावत ने उनके बारे में बहुत पहले लिखा था, “हाथ में एक तारा लेकर गाते हुए जब काल को आवाज़ लगाती हैं तीजन बाई, तो आकाश में देवता हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं.” कवि ने तीजन की प्रस्तुति देखकर ऐसा लिखा, लेकिन दाई ने अपनी इस प्रतिभा को बहुत कम उम्र में ही पहचान लिया था. छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोकपर्व ‘तीज’ के दिन जन्म होने के कारण माता-पिता ने उनका नाम रखा था, तीजन. शायद किसी ने तब नहीं सोचा होगा कि यही बच्ची आगे चलकर लोककला की ऐसी प्रतीक बनेगी, जिसकी आवाज़ में पूरा महाभारत सांस लेगा. अपने माता-पिता की इकलौती संतान तीजन को थोड़ा भी जानने वाले ये बखूबी जानते हैं कि थीं. उनका बचपन अभावों, संघर्षों और कठिन परिस्थितियों में बीता. तीजन दाई बताती किं- 'एक दिन उन्होंने अपने बुज़ुर्ग नाना बृजलाल पार्थी को पंडवानी गाते सुना. वह सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं थी, वह जैसे जीवन का आह्वान था. छोटी तीजन उस दिन मंत्रमुग्ध होकर बैठी रहीं. नाना की आवाज़, उनकी कथा कहने की शैली और महाभारत के पात्रों का जीवंत संसार उनके भीतर उतर गया. उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि पंडवानी ही उनका जीवन होगी.'
1956 में जन्मी तीजन बाई ने महज 13 वर्ष की उम्र में चंद्रखुरी गांव में पहली बार सार्वजनिक रूप से पंडवानी गाई. उसके बाद जैसे वह पूरी तरह इसी कला में डूबती चली गईं. उन्हें पढ़ने-लिखने का अवसर कभी नहीं मिला, लेकिन पंडवानी ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई. बाद में उन्होंने धीरे-धीरे अपना नाम लिखना सीखा, फिर हस्ताक्षर करना भी. लेकिन शब्दों की असली शिक्षा उन्होंने लोककथा, स्मृति और मंच से पाई थी. लेकिन नई पीढ़ी को ये बात शायद की पता हो कि तीजन का रास्ता आसान बिल्कुल नहीं था. जब उन्होंने अपने चचेरे नाना बृजलाल पार्थी से पंडवानी सीखना शुरू किया, तब उनकी उम्र सिर्फ नौ साल थी. समाज ने विरोध किया, परिवार ने तिरस्कार किया, यहां तक कि उन पर सामाजिक प्रतिबंध भी लगा दिए गए. उन्हें अपने ही घर से निकाल दिया गया. लेकिन वह रुकी नहीं. पंडवानी उनके लिए सिर्फ कला नहीं थी, वह उनका अस्तित्व थी. उनकी पहली शादी भी पंडवानी गाने की वजह से टूट गई. दूसरी शादी में भी यही कारण दरार बनकर सामने आया.
तीजन दाई बतातीं कि- ''एक बार मंच पर वह महाभारत की कथा सुना रही थीं. पूरा सभागार मंत्रमुग्ध था. तभी उनका पति वहां आया और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए हिंसक व्यवहार करने लगा. उस क्षण मैंने तंबूरा उठाया और पूरे आत्मसम्मान के साथ कहा, “तुमने केवल मेरा ही नहीं, मेरी कला और इस मंच का भी अपमान किया है. इसलिए तुम अब माफी के लायक नहीं हो, आज से तुम मेरे कोई नहीं हो.''
1960-70 के दशक में पंडवानी पुरुषों की कला मानी जाती थी. महिलाओं का मंच पर आना लगभग वर्जित था. लेकिन दो महिलाओं ने इस परंपरा को चुनौती दी, लक्ष्मीबाई बंजारे और तीजन बाई. लक्ष्मीबाई ने वेदमती शैली अपनाई, जबकि तीजन बाई ने कापालिक शैली चुनी, जिसमें कलाकार खड़े होकर अभिनय और नाटकीयता के साथ कथा प्रस्तुत करता है. यही शैली आगे चलकर उनकी पहचान बनी.
तीजन दाई की आवाज में पंडवानी की गूंज छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की सीमाएं पार कर देश और दुनिया तक पहुंची. तीजन बाई ने अनेक देशों में प्रस्तुतियां दीं. उन्होंने जहां भी गाया, लोग भाषा भूलकर भाव में डूबते चले गए. बाद में उन्हें भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी भी मिली. सम्मान और पुरस्कार उनके जीवन में लगातार आते रहे. 1988 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. 1996 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला. 2003 में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि दी. 2017 में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ ने भी उन्हें डी.लिट. से सम्मानित किया. फिर पद्मभूषण और देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण भी उन्हें मिला. लेकिन इन तमाम सम्मानों के बावजूद उनकी सबसे बड़ी पहचान वही रही, हाथ में तंबूरा लिए पंडवानी गाती हुई एक लोकगायिका.
साल 2018 में तीजन बाई को दिल का दौरा पड़ा था. इलाज के कुछ ही दिनों बाद वह फिर मंच पर लौट आईं और देश के अलग-अलग हिस्सों में पंडवानी प्रस्तुतियां देने लगीं. लेकिन कोरोना काल के दौरान उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया. सिर में खून के थक्के जम जाने की वजह से उनकी स्मरण शक्ति कमजोर होती चली गई. बीते दो वर्षों से वह लगभग बिस्तर पर थीं. धीरे-धीरे उन्हें बहुत कम बातें याद रहती थीं. समय भी बीतता गया और तालियों के बीच जीने वाली कलाकार तीजन एक कमरे की खामोशी में सिमटती चली गईं.
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